उत्तर मौर्य काल का इतिहास: मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत की स्थिति और नए राजवंशों का उदय






उत्तर मौर्य काल का इतिहास: मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद का भारत (185 ई.पू. – 300 ई.)







उत्तर मौर्य काल (Post-Mauryan Period): मौर्य साम्राज्य के बाद के भारत का विस्तृत इतिहास

प्रस्तावना: भारतीय इतिहास में उत्तर मौर्य काल (Post-Mauryan Period) एक ऐसा दौर था जिसने भारत की राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दिशा को पूरी तरह बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के अंतिम शासक वृहद्रथ की हत्या के बाद मगध की केंद्रीय सत्ता कमजोर हो गई और अखंड भारत छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों में विभाजित हो गया। 185 ईसा पूर्व से लेकर लगभग 300 ईसवी तक के इस कालखंड को ‘अंधकार युग’ नहीं, बल्कि ‘सांस्कृतिक संक्रमण’ का काल कहा जाता है।

एक तरफ शुंग, कण्व और सातवाहन जैसे देसी राजवंशों ने वैदिक धर्म का पुनरुत्थान किया, तो दूसरी तरफ इंडो-ग्रीक, शक, पहलव और कुषाण जैसे विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत की भूमि को अपना घर बनाया। इसी काल में कला की गांधार और मथुरा शैलियों का विकास हुआ और व्यापारिक रूप से भारत ‘सिल्क रोड’ से जुड़ा। आइए, इस रोमांचक ऐतिहासिक यात्रा पर चलते हैं और जानते हैं कि मौर्योत्तर भारत की तस्वीर कैसी थी।

1. प्रमुख देशी राजवंशों का उदय

मौर्यों के पतन के बाद भारत के आंतरिक हिस्सों में कई शक्तिशाली ब्राह्मण राजवंशों का उदय हुआ:

शुंग वंश (Sunga Dynasty)

पुष्यमित्र शुंग ने 185 ई.पू. में मौर्य सम्राट वृहद्रथ की हत्या कर शुंग वंश की नींव रखी।

  • पुष्यमित्र शुंग: इन्होंने दो अश्वमेध यज्ञ किए और ब्राह्मण धर्म को पुनः स्थापित किया।
  • योगदान: इनके समय में ‘मनुस्मृति’ का वर्तमान स्वरूप विकसित हुआ और भरहुत स्तूप का निर्माण हुआ।

सातवाहन वंश (Satavahana Dynasty)

दक्षिण भारत (दक्कन) में सातवाहनों ने एक लंबे समय तक शासन किया।

  • गौतमीपुत्र शातकर्णी: इस वंश का सबसे महान शासक। इसने शकों को हराकर साम्राज्य की प्रतिष्ठा वापस दिलाई।
  • विशेषता: इन्होंने सीसे (Lead) के सिक्के चलाए और भूमि दान की प्रथा को बड़े पैमाने पर शुरू किया।

2. विदेशी राजवंश और उनके आक्रमण

उत्तर-पश्चिम सीमाओं के असुरक्षित होने के कारण भारत पर कई विदेशी शक्तियों ने आक्रमण किया और यहीं बस गए:

  • हिंद-यूनानी (Indo-Greeks): इनमें मिनांडर (मिलिंद) सबसे प्रसिद्ध था। इन्होंने भारत में सबसे पहले सोने के सिक्के जारी किए।
  • शक (Shakas): शकों ने भारत के विभिन्न हिस्सों में अपनी शाखाएं स्थापित कीं। उज्जैन का रुद्रदामन प्रथम सबसे प्रतापी शक राजा था।
  • पहलव (Parthians): इनका सबसे प्रसिद्ध राजा गोंडोफर्नीस था, जिसके समय में ‘सेंट थॉमस’ ईसाई धर्म का प्रचार करने भारत आए थे।

3. सम्राट कनिष्क और कुषाण साम्राज्य

कुषाण वंश ने उत्तर मौर्य काल को एक वैश्विक पहचान दिलाई। कनिष्क को ‘द्वितीय अशोक’ भी कहा जाता है।

  • शक संवत: कनिष्क ने 78 ई. में राज्यारोहण के समय ‘शक संवत’ चलाया, जो आज भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर है।
  • बौद्ध धर्म: कनिष्क के समय कश्मीर के कुंडलवन में ‘चतुर्थ बौद्ध संगीति’ हुई, जहाँ बौद्ध धर्म हीनयान और महायान में विभाजित हो गया।
  • राजधानी: इनकी मुख्य राजधानी ‘पुरुषपुर’ (पेशावर) और द्वितीय राजधानी ‘मथुरा’ थी।

4. आर्थिक स्थिति और व्यापारिक मार्ग

उत्तर मौर्य काल आर्थिक रूप से अत्यंत समृद्ध था। भारत का व्यापार रोम के साथ अपने चरम पर था।

  • रेशम मार्ग (Silk Road): कनिष्क ने चीन से मध्य एशिया और रोम जाने वाले रेशम मार्ग पर नियंत्रण कर लिया, जिससे भारत को अत्यधिक सीमा शुल्क (Tax) प्राप्त हुआ।
  • सिक्के: कुषाणों ने सबसे शुद्ध सोने के सिक्के जारी किए, जबकि सातवाहनों ने क्षेत्रीय व्यापार के लिए सीसे के सिक्कों का उपयोग किया।

5. कला और संस्कृति का विकास

इस काल में भारतीय कला में विदेशी तत्वों का समावेश हुआ, जिससे दो प्रसिद्ध शैलियाँ जन्मीं:

  • गांधार शैली: इसे ‘इंडो-ग्रीक’ शैली भी कहते हैं। इसमें बुद्ध की मूर्तियाँ यूनानी देवताओं जैसी (घुंघराले बाल और मस्कुलर बॉडी) बनाई गईं।
  • मथुरा शैली: यह स्वदेशी शैली थी। इसमें लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग कर बुद्ध, कृष्ण और जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ बनाई गईं।

महत्वपूर्ण तथ्य (Important Facts)

  • चरक: कनिष्क के राजवैद्य, जिन्होंने ‘चरक संहिता’ लिखी।
  • अश्वघोष: कनिष्क के दरबारी विद्वान, जिन्होंने ‘बुद्धचरित’ की रचना की।
  • मिलिंदपन्हो: राजा मिनांडर और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच संवाद का ग्रंथ।
  • हाथीगुम्फा अभिलेख: कलिंग के राजा खारवेल की उपलब्धियों का वर्णन करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. उत्तर मौर्य काल का सबसे प्रसिद्ध विदेशी राजा कौन था?
कुषाण सम्राट कनिष्क इस काल का सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली विदेशी मूल का राजा था।

2. शक संवत की शुरुआत कब हुई?
शक संवत की शुरुआत 78 ईसवी में सम्राट कनिष्क द्वारा की गई थी।

3. सातवाहनों ने भूमि दान क्यों शुरू किया?
सातवाहनों ने धार्मिक पुण्य कमाने के लिए ब्राह्मणों और बौद्ध भिक्षुओं को कर-मुक्त भूमि देने की परंपरा शुरू की।

4. किस काल में बौद्ध धर्म महायान में बंटा?
कनिष्क के शासनकाल में हुई चौथी बौद्ध संगीति में बौद्ध धर्म हीनयान और महायान में विभाजित हुआ।

5. गांधार कला क्या है?
यह भारतीय विषय वस्तु और यूनानी निर्माण शैली का मिश्रण है, जो बुद्ध की प्रतिमाओं के लिए प्रसिद्ध है।

6. पुष्यमित्र शुंग ने किस मौर्य राजा को हराया था?
पुष्यमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य सम्राट वृहद्रथ की हत्या कर शुंग वंश की स्थापना की थी।

निष्कर्ष

उत्तर मौर्य काल (Post-Mauryan Period) भारतीय इतिहास का एक ऐसा अध्याय है जिसने विखंडन के बावजूद सांस्कृतिक और व्यापारिक ऊंचाइयों को छुआ। इस काल ने भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के केंद्र में रखा और कला की अनूठी शैलियाँ प्रदान कीं। कुषाणों और सातवाहनों के प्रशासनिक अनुभवों ने आगे चलकर गुप्त साम्राज्य के ‘स्वर्ण युग’ का आधार तैयार किया। यदि आप प्राचीन भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास को समझना चाहते हैं, तो उत्तर मौर्य काल का अध्ययन अनिवार्य है।


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